Damyanti -- Pustak Samiksha : Atulya Khare
Pustak Samiksha : Atulya Khare
समीक्षित पुस्तक : दमयन्ती
द्वारा : शिखा मनमोहन शर्मा
दृष्टि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित
प्रथम प्रकाशन : 2026
मूल्य : 250
समीक्षा क्रमांक : 246
शिखा मनमोहन शर्मा द्वारा लिखित उपन्यासों "नीरा" एवं "अभी मैं जिंदा हूँ" की समीक्षा पूर्व में मेरे द्वारा की गई थी एवं उनके द्वारा रचित इस तीसरी पुस्तक को पढ़ने के पश्चात लेखिका की शैली के विषय में अब निःसंकोच कहा जा सकता है कि वे मात्र कथानक में रंग ही नहीं भरती अपितु पात्रों के भावों को जीती हैं उनके पात्रों के मनोभावों की शाब्दिक अभिव्यक्ति ही उनके द्वारा हमारे समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं एवं अपने कथानक के पात्रों के मनोभावों को सहज स्वाभाविक एवं पूर्ण वास्तविकता के संग व्यक्त करने में उन्हें महारथ हासिल हैं।
प्रस्तुत पुस्तक "दमयंती", प्रसिद्द नल दमयंती की कहानी है जो युगों युगों से कही सुनी जाती रही है, तथा विलक्षण आत्मिक प्रेम के लिए सदैव ही जिसे उद्दऋत किया जाता रहा है।
बात करे यदि इस उपन्यास की प्रमुख विशिष्टता, इसकी शैली की तो उपन्यास में आत्मकथात्मक शैली के साथ-साथ कथाकार की प्रत्यक्ष टिप्पणी का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। वैसे आत्मकथ्य शैली का प्रयोग प्रमुखता से किया गया है। लेखिका पहले तो पात्र के मुख से उसकी बात कहलवाकर सीधे पाठक को उसके मन की थाह लेने का अवसर देती है और वहीं बीच में स्वयं आकर उसके मौन और पीड़ा को मुखरता से रेखांकित करते हुए स्पष्ट करती है। लेखिका की यह शैली पाठक को पात्र के दृष्टिकोण और लेखिका के तटस्थ दृष्टिकोण से एक साथ जोड़ती है।
कह सकते हैं की लेखिका ने इस उपन्यास को लिखने में एक अनूठी शैली अपनाई है, जहाँ पात्र स्वयं अपनी जुबानी अपनी व्यथा व्यक्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर कथाकार बीच-बीच में आकर उनके मौन और छिपे हुए दर्द को शब्दों में ढाल देती है। यथा जब पात्र अपनी उदासी का बयान स्वयं कर रहा होता है तभी ठीक अगले ही पल लेखिका का हस्तक्षेप उसके उस गहरे एकांत, व्यथित मनोभाव और आंतरिक संघर्ष को पाठकों के समक्ष अधिक स्पष्ट एवं जीवंत कर देता है।
एक ओर जहाँ पात्रों की जुबानी, संवादों के माध्यम से कथा को गति मिलती है, वहीं दूसरी ओर लेखिका का सूत्रधार रूप पात्र के अनकहे दर्दों और मनोवैज्ञानिक स्थिति का सूक्ष्म विश्लेषण करता है एवं यह तो विदित है ही की शिखा जी को मनोवैज्ञानिक भावों का विश्लेषण करने में कुशलता प्राप्त है।
महाभारत में वर्णित नल और दमयंती की कथा भारतीय साहित्य, संस्कृति और लोकमानस की अमर प्रेम कथाओं में एक है। इस कथा में जहाँ एक ओर अलौकिक प्रेम एवं प्रिय के प्रति निष्ठा का दर्शन होता है, वहीं दूसरी ओर राजनैतिक कूटनीति, जुए के व्यसन और भयंकर विछोह (वेदना) के बाद पुनर्मिलन की पूरी गाथा पढ़ने मिलती है।
जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वनवास काट रहे थे, तब युधिष्ठिर के दुखों को हल्का करने और उन्हें धैर्य बंधाने के लिए ऋषि वृहद्श्व ने उन्हें नल और दमयंती की कथा सुनाई थी।
सम्पूर्ण कथानक मे पात्र अत्यंत सीमित हैं। मुख्यतः तो राजा नल और दमयन्ती ही कथानक के केंद्र में हैं। राजा नल जो की निषध देश (वर्तमान मध्य प्रदेश-राजस्थान की सीमा से लगे क्षेत्र) के राजा थे, एवं महाराजा वीरसेन के पुत्र थे, वे अत्यंत वीर, सुंदर, सत्यवादी, अश्व-विद्या तथा पाक-कला में निपुण थे एवं सत्यव्रत और धर्मपरायणता के लिए जाने जाते थे। वहीं राजकुमारी दमयंती विदर्भ (वर्तमान महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र) देश के राजा भीम की एकमात्र और अत्यंत रूपवती-गुणवती पुत्री थीं। पुष्कर, नल के कनिष्ट भ्राता थे जबकि राजा ऋतुपर्ण अयोध्या के राजा हुआ करते थे एवं विदर्भ देश के साथ उनके मधुर संबंध थे ।
उस काल में राज घरानों मे वर की खोज हेतु 'स्वयंवर' एक स्थापित परंपरा थी जहाँ राजकुमारियों को अपने पसंद का वर चुनने की स्वतंत्रता थी। विदर्भ नरेश द्वारा आयोजित स्वयंवर में समस्त भूमंडल के विभिन्न देशों के राजाओं के अतिरिक्त इंद्र, अग्नि, वरुण, यम आदि देवताओं का पहुँचना इस बात का स्पष्ट प्रतीक है कि राजाओं का प्रभाव और प्रतिष्ठा उस समय कितने उच्च स्तर की हुआ करती थी ।
नल और दमयंती का प्रेम भौतिक आकर्षण से परे, मात्र गुणों की प्रशंसा से उपजा था। निषध देश में राजा नल की वीरता और विदर्भ में दमयंती के सौंदर्य की चर्चा हंस के द्वारा नल और दमयन्ती के सम्मुख कुछ इस तरह बखान की गई कि उसके बाद बिना मिले ही दोनों एक-दूसरे के मानस में बस गए और एक दूसरे के लिए प्रबल प्रेम भाव तथा विरह-वेदना का अनुभव करने लगे।
इस आत्मिक प्रेम की प्रबलता स्वयंवर में और अधिक स्पष्टता से देखने में आती है जहां स्वयंवर में इंद्र, अग्नि, वरुण और यम द्वारा दमयन्ती के प्रेम एवं आस्था को देखते हुए देवताओं ने स्वयं को स्वयंवर से अलग करते हुए नल को ही आशीर्वाद दिया गया।
उस काल में द्यूत क्रीड़ा राजाओं के बीच एक प्रिय राजसी शौक या व्यसन के रूप में व्याप्त था, और जैसा कि इतिहास गवाह है की यही शौक बड़े से बड़े साम्राज्य के पतन का कारण बना। नल की दुर्दशा की कथा भी इसी व्यसन का परिणाम थी।
विवाह के पश्चात कुछ समय तक उनका जीवन अत्यंत सुखमय बीता और दो संताने (इन्द्रसेन और इन्द्रसेना) हुईं। परंतु दैवयोग और नल के कनिष्ठ भ्राता पुष्कर के षड्यन्त्र के प्रभाव से नल के जीवन में बुरा दौर आया। पुष्कर ने नल को ध्यूत क्रीड़ा हेतु उकसाया एवं उस जुए में नल अपना सम्पूर्ण राजपाठ , धन-दौलत आदि सब कुछ हार गए। फलस्वरूप उन्हें वनवास जाना पड़ा । दमयंती ने समय रहते अपने दोनों बच्चों को एक सारथी के साथ पहले ही अपने मायके (विदर्भ) भेज दिया था।
जंगल में भटकते हुए एक रात जब दोनों भूखे-प्यासे एक वृक्ष के नीचे सो रहे थे, तब कुमति का शिकार हुए नल के मन में विचार आया कि "मेरे कारण ही दमयंती इस दुःख को भोग रही है, यदि मैं इसे यहाँ छोड़ जाऊँ तो शायद यह अपने मायके पहुँचकर सुरक्षित हो जाएगी।" इस पीड़ादायक विचार के साथ नल ने दमयंती की आधी साड़ी फाड़कर अपने ऊपर लपेटी और स्वयं रोते हुए दमयन्ती को सोते-छोड़कर वन में चले गए। यहीं से उनके अति पीड़ा दायी विछोह का दौर प्रारंभ हुआ, जिसमें दमयन्ती का चेदिराज सुबाहु के यहाँ राजमाता की संगिनी के रूप में अज्ञातवास बिताना और नल का छद्म नाम "बाहुक" से अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के यहाँ एक साधारण सारथि के रूप में कार्य करना प्रमुख रहे। वहीं एक सर्पदंश की घटना के पश्चात नल का रूप विकृत होना भी कथानक में अहम प्रसंग है।
दमयंती ने अपने पति को खोजने के लिए एक गुप्त युक्ति रची और पूरे देश में यह अफवाह फैला दी कि "विदर्भ नरेश की पुत्री दमयंती का दूसरा स्वयंवर होने जा रहा है", एवं एक सोची समझी रणनीति के तहत यह संदेश अल्प समय पूर्व मात्र अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण को दिया गया एवं वे अपने सारथी बाहुक (नल) के संग विदर्भ पहुंचे। वास्तव में इस तरह से नल की अश्व संचालन एवं निपुणता की जानकारी द्वारा उनकी पहचान करने की युक्ति थी ।
विदर्भ में दमयंती ने बाहुक (नल) के विशिष्ट गुणों यथा अश्व-संचालन एवं पाककला के द्वारा उन्हें पहचान लिया कि यही उसके पति नल हैं। अंततः दोनों का मिलन हुआ।
राजा नल ने राजा ऋतुपर्ण से जुए का ज्ञान सीखा और अपनी पत्नी व सारथि के साथ वापस निषध देश जाकर अपने भाई पुष्कर को पुनः जुए में पराजित किया। नल ने पुष्कर को क्षमा कर दिया और अपना खोया हुआ संपूर्ण साम्राज्य और वैभव पुनः प्राप्त किया।
नल और दमयंती की यह कथा केवल दो प्रेमियों के विछोह एवं मिलन की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक संदेश भी है कि जीवन के सबसे कठिन दौर (संकट, विछोह एवं दारिद्र आदि ) में भी यदि मनुष्य अपनी नैतिक मूल्यों, प्रेम और सत्य का साथ न छोड़े, तो भाग्य का चक्र एक दिन अवश्य अनुकूल हो जाता है।
अतुल्य खरे
इस समीक्षा के पश्चात आप शिखा जी द्वारा लिखित इन उपन्यासों की समीक्षा भी अवश्य पढ़ें ,Pustak Samiksha : Atulya khare



.jpg)
.jpg)

.png)


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें